Friday, March 4, 2016

कन्हैया

ना काहू से दोस्ती, ना काहू से बैर ...

एक प्रश्न ...

कन्हैया को पुलिस ने doctored वीडियो के कारण पकड़ा ... पूछताछ की ... भारतीय कानून के हिसाब से कोर्ट ने उसे सशर्त bail देदी ...

अब प्रश्न ये है कि इस से कन्हैया हीरो कैसे बन गया ?

क्या वो ऐसा प्रथम भारतीय है जिस के साथ ऐसा हुआ ??

क्या वो ऐसा अंतिम भारतीय है जिस के साथ ऐसा होगा ??

क्या इस मामले में ज़मानत मिलते ही कन्हैया दोष मुक्त हो गया ??

गरीबी से लड़ने वाले कन्हैया के वकील कपिल सिब्बल कैसे बन गए ??

उन की फीस कौन दे रहा है ??

यदि कपिल सिब्बल फीस नहीं ले रहे तो उन का इस केस में कैसा स्वार्थ है ?? क्योंकि ये हम सब बाखूबी जानते हैं कि कपिल सिब्बल निःस्वार्थ देश प्रेमी तो हैं नहीं ...

यदि कपिल सिब्बल की फीस कोई और दे रहा है तो उस का क्या स्वार्थ क्या है क्योंकि बहुत से गरीब ऐसे केसों में फंसे रहते हैं और उन के लिए कोई निःस्वार्थ व्यक्ति कपिल सिब्बल सरीखे बड़े वकीलों की  सेवा नहीं लेता ...

कन्हैया की स्पीच मैंने नहीं सुनी परंतु ये सुना है कि उस ने हमारे बड़बोले , मन की बात करने वाले आदरणीय प्रधान मंत्री जी की धज्जियां उड़ा दी ...

क्या किसी की धज्जियाँ उड़ा कर व्यक्ति महान हो जाता है ??

कन्हैया को आज़ादी चाहिए .. बिलकुल सही ...

 लोकतंत्र में हर व्यक्ति आज़ाद जीना चाहता है परंतु आज़ादी का अर्थ उन्मुक्त आज़ादी नहीं है कि हम कुछ भी कर पाएं ... आज़ादी कर्तव्य से जुडी होती है , ऐसा सब को ज्ञात रहे ...

 कन्हैया गरीबी से परेशान है ... और उसे इस बात का क्रोध है ... होना भी चाहिए ... क्योंकि ये हमारी 68 सालों की सरकारों और हमारे चुने हुए जनप्रतिनिधियों और हमारे जनसेवकों की अकर्मण्यता ही है जो गरीबी आज तक दूर नहीं हुई ...

 परंतु

क्या इस के लिए आज की केंद्र सरकार दोषी है या पिछले 68 सालों की केंद्र और राज्य सरकारें और हम सुप्त नागरिक  ??

ये प्रश्न कन्हैया और हम सब अपने आप से ज़रूर करें ....

Monday, February 29, 2016

बदलते समय की सशक्त महिलायें ...

अब सहना नहीं है , अब आवाज़ उठा कर उसे अंजाम तक ले जाना है

कब तक मर्यादाओं का बोझ ढोती रहेंगी महिलायें ...

हवस किसी की, बर्बरता कोई करे और इज़्ज़त निरपराध की जाए ??

ये कैसा समाज है ...

महिलाओं बलात्कार से आप का शरीर दूषित नहीं होता वरन उस माँ की कोख दूषित होती है , उस घर की मर्यादा घटती है जिस घर ने उस बलात्कारी जीव को जन्म दिया और उसे मातृ शक्ति का आदर ना करने के संस्कार दिए , मर्यादा उस व्यक्ति की घटती है जो अपनी किसी भी भूख को मर्यादा के दायरे में नहीं बाँध पाया ...


एक बात अब हर महिला को समझनी और गाँठ बांधनी होगी कि बलात्कार उन के साथ हुआ एक दुष्कृत्य है जिस की ज़िम्मेदारी उस घृणित मानसिकता के व्यक्ति और साथ ही उस के परिवार और उस से जुड़े हर व्यक्ति की है ...


बलात्कार करने वाले ने एकांत में नग्नता का प्रदर्शन किया था और उस के बाद उस की नग्नता को समाज के सामने लाना अब आप की ज़िम्मेदारी है , किसी की भी विकृत मानसिकता का बोझ कोई महिला क्यों ढोये ...


जो बलात्कार का शिकार हुई महिला को कलंकित करता है या आरोपित करता है तो समस्त महिला समाज को उसे अपने भारतीय समाज से बहिष्कृत करना होगा ...

ऐसे व्यक्ति से समस्त संबंध विच्छेद करने होंगे, उस की पैरवी करने वाले हर शख्स को बहिष्कृत करना होगा ...

अब महिलाओं को ही अपने आप और अपने समाज को शक्ति प्रदान करने हेतु आगे आना होगा ...

सज़ा बलात्कारी को मिलती है , पीड़ित को नहीं ...

उठिए और अब इस शोषण के विरुद्ध आवाज़ उठाइये ...

Monday, July 13, 2015

हमारा पार्षद कैसा हो ?

दैन दिन्य  की ज़िन्दगी में हमारा सफाई , पानी, बिजली , सड़क , नाली , आवारा पशु आदि से पाला पड़ता है ....

67 साल की व्यवस्था की दुर्दशा से छुटकारा पाने का इरादा है इस बार ....

अपने वोट के बहुमूल्य होने का एहसास भी हो चुका है ...

रोज़ रोज़ की ज़िन्दगी में अब राजनैतिक पार्टियों की कोई जगह नहीं दीख पड़ रही है ....

अब  चाहिए जनता के द्वारा चुना गया , जनता के लिए चुना गया और जनता के प्रति उत्तरदायी / जवाबदेह पार्षद ..... 

हमें चाहिए एक कर्मठ सेवा भावी पार्षद जो अपने वार्ड वासियों के लिए सदैव उपलब्ध हो ...

सो अब समीक्षा करते हैं अपनी अपेक्षाओं की ...



1.  हमारा पार्षद स्थानीय हो जिस से वो हमें दिन हो या रात सदैव उपलब्ध रहे ...

हम अपनी सहूलियत से उस के पास अपना काम ले कर जा सकें 

नाकि 

उस की सहूलियत से हम अपने कामों को रोके रखें ... 

आखिर उन्हीं कामों के लिए तो हम ने उसे अपना बहुमूल्य वोट दे कर चुना है...


2.  हमारा पार्षद पढ़ा लिखा होना चाहिए ....

कम से कम ग्रेजुएट ....

एक पढ़ा लिखा सुलझा हुआ बन्दा ही दांव पेंच से परे, समस्याओं को समझ कर ,उन्हें सुलझाने का प्रयत्न कर सकता है ...


 3.  हमारा पार्षद किसी भी राजनैतिक पार्टी से सम्बद्ध ना हो ...

आज तक हम ने यह ही देखा है कि पार्टी से जुड़े हुए हमारे प्रतिनिधि चुनाव जीतने के बाद हमारी कम और पार्टी की ज़यादा चिंता करते हैं ....

वे पार्टी की नीतियों से बंधे होते हैं ...

हमें अब ऐसे पार्षद चाहियें जो अपने मतदाता , यानि , हम से जुड़े हों ...

जिन्हें पार्टी लाइन की नहीं अपने मतदाताओं की इच्छा की चिंता हो ...

जो अपने मतदाता और अपने चुनाव क्षेत्र की समस्याओं के लिये लड़ें और उन्हें सुलझाएं ....

ऐसा ना हो कि क्षेत्र में अतिक्रमण हो और अतिक्रमण करने वाला किसी नेता का परिचित हो 

और 

पार्षद महोदय अपने मतदाताओं और अपने कर्तव्य को भूलकर अतिक्रमी की मिज़ाज़ पुरसी में लीन हो जाएँ ....

इस लिए हमारा पार्षद सिवाय हमारे किसी भी राजनैतिक दल या क्लब का सदस्य नहीं वरन हमारे वार्ड का सदस्य हो ...

दूसरे शब्दों में हमें निर्दलीय पार्षद चुनने होंगे ...

जो हमारा पार्षद बनाना चाहता है उसे किसी भी राजनैतिक पार्टी का सदस्य नही होना चाहिए ... 

और

यदि वो किसी राजनैतिक पार्टी से सम्बन्ध रखता है तो चुनाव पूर्व उसे उस पार्टी की प्राथमिक सदस्यता से त्यागपत्र देना होगा

 और 

साथ ही एक शपथ पत्र भी देना होगा कि जब तक वो पार्षद रहेगा तब तक वो किसी भी राजनैतिक पार्टी की सदस्यता ग्रहण नहीं करेगा ...

 वह पूर्णत: जनता का प्रतिनिधि ही बन कर रहेगा ...



4.  हमारे  पार्षद का अपने वार्ड में एक ऑफिस होना चाहिए जिस में वो अथवा कोई भी सक्षम व्यक्ति , कम से कम , सुबह 8 बजे से शाम 7 बजे तक उपलब्ध रहे ....

तथा

वार्ड के हर बूथ स्तर पर कम से कम एक ऐसा सक्षम व्यक्ति नियुक्त हो जिस से कोई भी मतदाता जो वार्ड ऑफिस तक नहीं जा सके , वो अपनी समस्या से उस सक्षम व्यक्ति को अवगत करवा सके ....

साथ ही हमारा पार्षद अपने वार्ड का एक हेल्पलाइन नंबर भी उपलब्ध करवाये जिस पर फोन कर के नागरिक अपनी समस्याओं से उन्हें अवगत करवा सकें ……

दूसरे शब्दों में हमारा चुना हुआ पार्षद अपने मतदाता के लिए उपलब्ध रहे और उन की समस्याओं के निराकरण हेतु निरंतर प्रयासरत रहे ....


 5.  हमें अपने पार्षद से ये अपेक्षा है कि वह हमारे नगर निगम के काम अपने वार्ड ऑफिस से ही करवा दे जिस से स्थानीय नागरिक को निगम के चक्कर ना लगाने पड़ें ...

आज आम नागरिक अपने पार्षदों को चुनने के बाद भी जन्म मृत्यु पंजीकरण , नक़्शे पास करवाने हेतु , अतिक्रमण की शिकायत हेतु , आवारा पशुओं को पकड़वाने हेतु , bpl कार्ड या राशन कार्ड बनवाने हेतु और किसी भी प्रकार की निगम द्वारा दी जा रही पेंशन या सहायता हेतु निगम के चक्कर काटता रहता है ... 

आम मतदाता पार्षद को कार्य सम्पादन हेतु चुनता है , फिर वो चक्कर क्यों लगाए ??

इस लिए अब हमें अपने पार्षद से ये अपेक्षा रहेगी कि वह अपने वार्ड कार्यालय के मार्फत हमारे कार्य करवाये ....



 6.  हमारे टैक्स के पैसों से सरकार हमारे लिए विभिन्न योजनाएं चलाती है ...

हमारी अपने पार्षद से ये अपेक्षा रहेगी कि वह नगर निगम के अंतर्गत आने वाली सभी योजनाओं की जानकारी रखे 

और 

मौहल्ला सभाओं के या बूथ सभाओं के माध्यम से अपने मतदाताओं को ये जानकारी दे व उसका लाभ भी दिलवाये ....



 7.  हमारा पार्षद हर माह एक वार्ड सभा के माध्यम से अपने मतदाताओं के रूबरू हो और उन से संवाद कायम करे ...

       यदि कार्यसम्पादन में उसे कोई कठिनाई का सामना करना पड़ रहा है तो वह खुल कर वार्ड सभा के माध्यम से इस का अपने मतदाताओं से ज़िक्र करे जिस से सब मिल कर उस समस्या का समाधान निकाल सकें  …… 

हम दो तरफ़ा संवाद इसी लिए चाहते हैं ताकि किसी भी प्रकार का communication gap ना रहे और हम अपने पार्षद की समस्या भी समझ सकें .... 

और 

यह तभी हो पायेगा जब हमारा पार्षद पारदर्शी तरीके से हम से निरंतर संवाद में रहे .... 


 8.  हमारा पार्षद अपने वार्ड के सफाई कर्मियों की लिस्ट अपने ऑफिस के बाहर चस्पा करे

और 

कौन सा सफाई कर्मी किस जगह सफाई कर रहा है ये रोज़ सुबह शाम ऑफिस के बाहर सूचना पट्ट पर अंकित हो ....

साथ ही सफाई कर्मियों की उपस्थिति सार्वजनिक रूप से अंकित हो ...

जिस से उपस्थिति के अनुसार ही ,जनता के टैक्स के पैसे से जो सफाईकर्मियों को भुगतान होता है, उस की पारदर्शिता बनी  रहे .....


9.  हमारा पार्षद अपने स्वीकृत पार्षद कोष को वार्ड सभा के माध्यम से , अपने मतदाताओं की इच्छा अनुरूप खर्च करे  ....

इस के लिए सर्वप्रथम नियमित बूथ सभाओं के माध्यम से हर बूथ की समस्या और ज़रुरत की जानकारी जुटाई जाए ....

हर समस्या और ज़रुरत की priority सेट की जाए और उन की अनुमानित लागत पता लगाईं जाए ....

फिर वार्ड सभा के माध्यम से priority और ज़रुरत के हिसाब से कौन सा कार्य पहले करवाया जाना चाहिए इस को चिन्हित कर लिस्ट बनायी जानी चाहिए

 और 

इस लिस्ट को वार्ड सभा से अनुमोदन करवाने के बाद ही उन कार्यों को करवाने की पार्षद द्वारा अनुशंसा की जानी चाहिए 

और 

फिर इसी के अनुसार पार्षद निधि का उपयोग किया जाना चाहिए ...


 10.  हमारे  पार्षद द्वारा अपने वार्ड के लिए स्वीकृत निधि से करवाये जाने वाले कार्यों को नागरिक निगरानी समिति की देख रेख में करवाना चाहिए ...

इस नागरिक निगरानी समिति का गठन हर बूथ के नागरिकों की सहभागिता से होना चाहिए ...

हर कार्य के लिए समिति का गठन वार्ड सभा के माध्यम से किया जाना चाहिए

यथा

रोड निगरानी समिति , नाली निगरानी समिति , अतिक्रमण निगरानी समिति , सफाई व्यवस्था निगरानी समिति , स्ट्रीट लाइट निगरानी समिति, आवारा पशु निगरानी समिति आदि ....

इन समितियों में हर बूथ से कम से कम एक व्यक्ति होना चाहिए और कोई भी व्यक्ति दो समितियों का मेंबर नहीं हो सकता ....

इस प्रकार आम आदमी में अपने वार्ड के कार्यों के प्रति सहभागिता की भावना घर करेगी ...

कोई भी विकास कार्य इन निगरानी समितियों की देख रेख में संपन्न होगा

 और 

इन समितियों द्वारा हरी झंडी दिए जाने के बाद ही पार्षद निगम को पैसों के भुगतान की अनुशंसा करेगा ...


11.  हमारा पार्षद अपने मतदाताओं के प्रति उत्तरदायी होगा 
और 
चुनाव से पहले वो अपने वार्ड के मतदाताओं को एक शपथ पत्र लिख कर देगा कि यदि वह उन की इच्छाओं के अनुरूप कार्य नहीं कर पाया
 तो 
वार्ड वासी अपने स्तर पर दो तिहाई बहुमत से उसे रिकॉल कर सकते हैं 
और 
यदि ऐसा हुआ तो वह निगम से अपनी सदस्यता से त्यागपत्र दे देगा ...


तो इस बार अजमेर की जनता कुछ ऐसा नगर निगम का बोर्ड बनाना चाहती है जो किसी राजनैतिक पार्टी के प्रति उत्तरदायी ना हो 

अपितु

जो मतदाता अपना बहुमूल्य वोट दे कर उसे जिताएंगे वे उन की इच्छा के अनुसार काम करें ...


अब स्वार्थनीति नहीं लोकनीति का बोर्ड चाहती है अजमेर की जनता ....

Friday, May 22, 2015

आरक्षण के नाम पर होते खेल ....

आज बात करते हैं आरक्षण की ....
पर
साथ ही मेरा अपने सभी साथियों से निवेदन है कि यह एक अति संवेदनशील मुद्दा बन गया है ....
इस लिए
इसे पूर्णता में पढ़िए ……

आक्षेप लगाने से पहले, जो भी आप को समझ आये, मुझ से ज़रूर पूछिये ……

परन्तु मेरे शब्दों को अपनी मानसिकता के साथ जोड़ते हुए विश्लेषण ना कीजिये ……

इस बार मेरे लेख का विश्लेषण मुझ से ही करवाइये …

एक नहीं, हज़ार प्रश्न कीजिये और मैं आप को उत्तर देने को बाध्य हूँ ……

एक बात स्पष्ट कर दूँ -
आरक्षण के बारे में ये मेरी व्यक्तिगत सोच है
और पार्टी की सोच इस से इतर हो सकती है .....

आरक्षण की मैं पक्षधर हूँ
परन्तु
आज के आरक्षण की नहीं ....

अब इस सोच को समझने का प्रयत्न करते हैं .....

जब देश स्वतंत्र हुआ तो उस समय की परिस्थितियों को देखते हुए दलित वर्ग के आरक्षण की ज़रुरत महसूस हुई ....

ये उस समय के लिए सही था ...

भारतीय संविधान में समयबद्ध आरक्षण रखा गया ....

निश्चित समय पश्चात इस की समयावधि बढ़ाई गयी ....

और आज स्वतंत्रता के 68 साल के बाद भी हमारे राजनैतिक दल जो कि सरकार के रूप में कार्य कर रहे थे इस आरक्षण को पूर्ण रूपेण लागू नहीं कर पाये ....
और
हमारे दलित सह नागरिक आज भी गरीबी और बेकारी का जीवन जीने को मजबूर हैं ....

इस आज की स्थिति के लिए दोषी कौन है ???

 # वो सरकारें जो इस आरक्षण का लाभ दलितों को ना दे पायीं ?

# वो राजनैतिक दल जो हमारे दलित साथियों की कमज़ोरी का फायदा उठा कर आरक्षण के नाम पर अपने स्वार्थ की रोटियां सेकने लगे ?

3 वो दलित समाज के ठेकेदार जो अपने ही समाज के लोगों की बेबसी का फायदा उठा कर उन के नेता बन कर अपना स्वार्थ सिद्द करने लगे ?

# वो दलित समाज के अमीर जो आरक्षण का लाभ बार बार लेते रहे और उसे अग्रिम पंक्ति से अंतिम पंक्ति तक नहीं पहुँचने दिया ?

या फिर 

# वो दलित साथी जो इतने सालों की आज़ादी के बाद भी अपने भले के लिए दूसरों का ही मुँह ताकते रहे ?

मनन कीजिये ....

दोषी कौन ???

आज समाज में कई वंचित वर्ग हैं और कई सर्व संपन्न .....

खाई लगातार बढ़ती जा रही है.....

भारतीय संविधान के अनुसार भारत का हर गरीब , यहाँ तक कि , भारत का भिखारी भी सरकार को टैक्स देता है और उस टैक्स के पैसे से ही सरकार चलती है ....

सरकार चलती क्या है जी दौड़ती है - आलीशान सरकारी ऑफिस,सरकारी घर,सरकारी गाड़ियों और सरकारी मोटी मोटी तनख्वाहों से ....

जब कि इस विकासशील देश की प्राथमिकता होनी चाहिए सब नागरिकों को कम से कम न्यूनतम बुनियादी जीवन आधार उपलब्ध करवाना .....

जी हाँ हम आरक्षण की बात कर रहे हैं.....

आरक्षण आज भारतीय राजनीति की मजबूरी बन गया है ....

भारतीय राजनीति की डोर वोट बैंक में है ...

हमारी सरकारें और राजनैतिक दल काम कर के वोट नहीं लेना चाहते हैं ....

वे समाज को वर्गों में बाँट कर आसान वोट लेते हैं ....

 आरक्षण का मुद्दा सब से आसान वोट बैंक देता है ....


अब इस जाल से हमारे नागरिकों को स्वयं निकालना होगा ....

अपने आप को आरक्षण की सच्चाइयों से रूबरू कीजिये ....

पिछले 68 सालों से चली आ रही आरक्षण व्यवस्था में ऐसा क्या है कि इस से आज तक सम्पूर्ण वंचित वर्ग लाभान्वित नहीं  हो पाया है ??

अब खरी खरी कहने और समझने का वक्त आ गया है....

यदि सरकारें कार्य के प्रति समर्पित होतीं तो आरक्षण का लाभ निश्चित समयावधि में ना केवल सभी वंचित वर्ग को मिल चुका होता वरन आज भारत का सामाजिक नक्शा कुछ और ही होता ....

आरक्षण के प्रति ना सरकारें, ना राजनैतिक दल  और ना ही समाज के ठेकेदार संजीदा हैं ,,,,,

सब  को ही अपनी अपनी रोटियां सेकने से फुर्सत नहीं है ....

अब समय है आँखें खोल कर देखने का....

सच्चाई से रूबरू होने का ....

सभी वंचित वर्ग के भाइयों और बहनों से एक प्रार्थना ....

अपनी आँखें खोलिए - आप ही के समाज के ठेकेदार आरक्षण का लाभ आप तक नहीं पहुँचने दे रहे .....

वे आप की गरीबी और अशिक्षा का फायदा उठा कर आप को भीड़ तंत्र की तरह काम ले रहे हैं और अपने स्वार्थ सिद्द कर रहे हैं ....

आप के आंदोलन की आड़ में  कमरों में सौदे होते हैं ....

स्वार्थ के सौदे ....

 टिकट और नौकरियों और व्यापार के सौदे ....

और बाहर  आ कर आप को लॉलीपॉप पकड़ा दी जाती है जो कि असलियत  में किसी काम की नहीं होती वरन उस में अगले आंदोलन के लिए loop holes होते हैं जिनका समय आने पर फिर उपयोग किया जा सके ....


आज सभी मनन करें आप को आरक्षण की दरकार क्यों है ??

क्यूंकि आप आर्थिक रूप से कमज़ोर हैं .....

यदि आज आप आर्थिक रूप से सक्षम होते तो जातिवाद गौण होता ....

आज का समाज अर्थ आधारित है ....

तो आरक्षण भी उसी के अनुरूप होना चाहिए ना .....

अब बात करते हैं उस आरक्षण की जिस का पक्ष मैं आप सब के सामने रखना चाहती हूँ ....

हाँ मैं आरक्षण की पक्षधर हूँ ....

मैं चाहती हूँ कि जैसे ही भ्रूण माँ की कोख में आये उसे अपनी माँ सहित आरक्षण का लाभ मिलने लगे .....

कोई भी गरीब माँ कुपोषित बच्चा पैदा ना करे .....

कोई भी बच्चा पैदा होने के पश्चात दूध के बिना ना पले और फिर पूरा पोषण लेते हुए बड़ा हो ....

सरकारी स्कूल ऐसे हों जहाँ बच्चों  का पूरा दिन ध्यान  रखा जाए ....

हर  बच्चे पर समान रूप से मेहनत की जाए और उस की रूचि को देखते हुए उस की उच्च शिक्षा का प्रबंध किया जाए ....

आरक्षण काबिलियत का हो और सब को सामान अवसर मिलें .....

सरकारी योजनाएं शिशु केंद्रित हों क्यूंकि ये शिशु ही हमारा भविष्य हैं .....

समान अवसर और समान पोषण और समान शिक्षा के बाद सभी समान रूप से अपनी काबिलियत के अनुसार कार्य करें .....

ऐसे आरक्षण की ज़रुरत है हमारे देश को ....

कोख से कॉलेज तक का आरक्षण - इस की दरकार है समाज को .....

और ये तब ही मिल सकता है जब हम इस आरक्षण के खेले को खेलने वालों पर अपने आप लगाम लगाएंगे.....

हम स्वयं कहेंगे कि आप के जाल में हम नहीं फंसेंगे .....

अब सब आप के हाथ में है चाहे स्वार्थ के हाथ का खिलौना बनिए या अपने सुनहरे भविष्य ओर स्वयं कदम बढाइये .....

Friday, May 15, 2015

आज अजमेर फिर ठगा गया

अखबार के माध्यम से सूचना मिली कि अजमेर में अवैध निर्माण पर हाई कोर्ट के निर्णय के अनुसार गाज गिरेगी....

ह्रदय को संतोष हुआ कि अजमेर स्मार्ट सिटी की ओर एक कदम बढ़ा .....

परंतु

मस्तिष्क में एक विचार कुलबुलाया कि क्या इस अवैध निर्माण के लिए सिर्फ अवैध निर्माण मालिक ही दोषी है क्या ?

निस्संदेह नहीं ...

हम कार्यवाही की गाज सिर्फ भवन मालिक पर ही नहीं गिरा सकते ...

*क्या इस में वो पार्षद दोषी नहीं जिस की नाक तले ये निर्माण हुआ ...

*क्या वो निगम अधिकारी दोषी नहीं जिस की ड्यूटी है कि वो समय समय पर अपने कार्य क्षेत्र का दौरा करे और निगाह रखे ...

*क्या वो निगम का अधिकारी दोषी नहीं जिस ने घरेलू नक्शा पास कर के व्यावसायिक भवन को completion certificate दिया?

*क्या वो निगम कर्मचारी दोषी नहीं जो रोज़ उस वार्ड में काम करता है ?

और

साथ ही

*क्या वो आम आदमी दोषी नहीं जिस ने पडोसी से सम्बन्ध के कारण उसे देख के अनदेखा किया ?

फिर गाज निर्माण मालिक पर ही क्यों ?

हमारे विश्लेषण का ये अर्थ कदापि नहीं कि हम भवन मालिक को किसी भी प्रकार की रियायत देने के पक्षधर हैं ...

जो व्यक्ति आज अपने लाखों रुपये डूबने की दुहाई दे रहा है वो निर्माण करवाते समय ये भली भाँति जानता था कि ये निर्माण अवैध है और फिर भी उस ने नियमों को दर किनार कर अपने स्वार्थ को तरजीह दी ...

वो कदापि दया का पात्र नहीं है और उस पर कठोर कार्यवाही बनती है ...

परंतु

मुद्दा ये है कि क्या अब जागरूकता के इस माहौल में भवन मालिक के साथ मिल कर अवैध निर्माण के साथी रहे पार्षद ,अफसर और कर्मचारियों को यूँ ही छोड़ देना चाहिए ?

क्या उन की जवाबदेही नहीं बनती ?

हम तो इस बात के पक्षधर हैं कि मालिक के साथ साथ दोषी निगम पार्षद व निगम कर्मियों को भी दंड मिलना चाहिए ...

और

उन की अपने अपने क्षेत्र के लिए जवाबदेही तय की जानी चाहिए ...

हर निगम कर्मी को एक निश्चित समयावधि में लिखित में ये रिपोर्ट सौंपनी चाहिए कि उन के क्षेत्र में कोई अवैध निर्माण व अतिक्रमण नहीं हो रहा ...

और

यदि कभी भी कोई अतिक्रमण या अवैध निर्माण पाया जाता है तो उस निगम कर्मी को दण्डित करने का प्रावधान होना चाहिए ...

आज ये ही सब सोच कर आम आदमी पार्टी अजमेर के सदस्यों ने नगर निगम के मुख्य कार्यकारी अधिकारी को इस बाबत एक ज्ञापन देने की ठानी ...

परंतु

आज माननीय उच्च न्यायालय के एक फैसले के कारण उस ज्ञापन का औचित्य नहीं रहा ...

आज माननीय अदालत ने अवैध निर्माणों को सीज़ करने की कार्यवाही पर रोक लगाते हुए उन के नियमन की अनुशंसा की ...

(कोर्ट का पूर्ण आदेश नहीं प्राप्त होने के कारण पूर्ण टिप्पणी नहीं कर पा रहे )

आज अजमेर फिर ठगा गया ...

Monday, May 11, 2015

लूट मची है लूट

स्मार्ट सिटी बनने की ओर अजमेर ने बहुत ख़ुशी ख़ुशी एक कदम बढ़ाया ...

टेम्पो यूनियन , ऑटो यूनियन और सिटी बस यूनियन ने विरोध किया परंतु विरोध ठन्डे बस्ते में पहुँच गया ...

इस पर चर्चा अगली बार ...

हाँ तो स्मार्ट सिटी बनने चले अजमेर की टैक्सी सर्विसेज की बात करते हैं ...

सब से पहले आई Ola टैक्सी सर्विस ...

अजमेरवासियों ने खुले दिल से स्वागत किया परंतु कुछ ही दिनों में इस का बुकिंग सिस्टम धोखा दे गया ...

अब मुद्दे पर आते हैं -

बात करते हैं Taxi for Sure कंपनी की ....

अभी तक ये कंपनी पहले चार किलोमीटर पर 49 ₹ ले रही थी और फिर हर किलोमीटर पर और साथ ही यदि ग्राहक रुकता है तो वेटिंग चार्जेज भी ....

बिलकुल सही ...

परंतु

आज शाम को जब टैक्सी बुक कराने के लिए फोन किया तो ज्ञात हुआ कि हर किलोमीटर पर charge करने के साथ ही साथ अब कंपनी route time पर भी चार्ज करेगी
यानि कि ग्राहक हर किलोमीटर की सवारी का तो पैसा देगा ही साथ ही उसी दूरी को तय करने में जितना समय लगता है उसे हर मिनट का भी किराया देना होगा ...

आज के इस जागरूक समय में ये बात गले नहीं उतरी कि distance covered के साथ ही साथ हम समय के भी पैसे दें ...

कल्पना करें कि अजमेर में दरगाह ज़ियारत के लिए कोई शासन प्रमुख आता है और आप Taxi for Sure की गाडी में जा रहे हैं और आप को जाम में रुकना पड़ा तो आप के 15 मिनट का लक्ष्य अब खिसक कर 45 मिनट में पूरा हुआ ....

हम प्रति किलोमीटर के साथ + 45 ₹ देंगे क्योंकि चाहे हम ने 10 किलोमीटर की यात्रा की परंतु हम पूरे 45 मिनट तक कार में बैठे रहे सो उस का समयबद्ध किराया देना भी ज़रूरी है ..

मैंने तो आज ये सुनते ही टैक्सी का विचार छोड़ दिया ...

मेरे पति की गाढ़े पसीने की कमाई को एक ही जगह जाने के लिए दो दो बार पैसे क्यों दूँ ?

मेरा हर साथी आम नागरिक से निवेदन है कि ऐसी कंपनी जो एक ही स्थान तक पहुंचाने के लिए आप से दो दो बार वसूली करे उसे नकारना ही बेहतर रहेगा ...

हम अपने लक्ष्य तक पहुँचने के लिए किलोमीटर के हिसाब से पैसे दे ही रहे हैं , अगर कहीं टैक्सी रोकते हैं तो वेटिंग चार्ज भी देने को तैयार रहते हैं फिर ये trip time पर पैसा वसूली क्यों ?

आशा है ग्राहक जागेगा और कंपनी की मनमानी वसूली के विरोध में Taxi for Sure कंपनी की सेवाएं लेने से तब तक परहेज़ करेगा जब तक वो trip time के पैसे वसूलने का फरमान वापिस नहीं लेते ...

हमारा पैसा पेड़ पर नहीं उगता वरन ये हमारे कठोर परिश्रम से हमें प्राप्त होता है अतः हम इसे फ़िज़ूल में किसी को नहीं देंगे ...

जय हिन्द !!!

Wednesday, April 22, 2015

यथार्थ से रूबरू

कल एक सच से रूबरू हुए ..

स्वीकारोक्ति - किसान की आत्महत्या एक समाचार होती थी...

परंतु कल के वाकये ने झकझोर कर रख दिया ...

ऐसा क्या हो गया कि किसान को संगठित कर के ,उन्हें सम्बल दे कर ,उन की लड़ाई लड़ने की रैली में हमारा एक किसान भाई अपने आप को समाप्त कर ले ?

गजेन्द्र जी की मृत्यु कई सवालों को जन्म दे गयी है ...

1. हमारे देश में अन्नदाता ही भूखा क्यों ?

2. क्यों आज तक ,देश को स्वतंत्र हुए 66 सालों से अधिक समय में हम, गाँवों में बसे इस देश को, एक स्वस्थ किसान नीति नहीं दे पाये ?

3. क्यों हमारा किसान अब तक प्राकृतिक संसाधनों पर ही निर्भर है ?

4. क्यों वह आज कर्ज़ों के बोझ तले डाब कर आत्महत्या को मजबूर है ?

सरकार आज किसानों समेत आम नागरिकों के वोट से चुनें जाने के बाद, किसानों और आम नागरिकों के टैक्स के पैसे से अय्याशी करती है और किसान पैसों के अभाव में दम तोड़ देता है .....

क्या अब समय नहीं आ गया है कि हमारे पैसों की जवाबदेही तय की जाए ?

क्या हमारे किसान भाइयों , जो कि हमारे मुँह में जीवनदायिनी निवाला पहुंचाता है, के प्रति हमारे और उन के द्वारा चुनें गए जनप्रतिनिधियों की कोई ज़िम्मेदारी नहीं बनती ?

कब तक हम मूक दर्शक बन कर इन सरकार के नुमाइंदों को अपना राजा बने देखते रहेंगे ?

क्यों हमारे किसान भाइयों के नुकसान का आकलन दूसरे हाथों में रहेगा ?

क्यों नहीं स्थानीय ग्राम सभा स्वयं प्राकृतिक नुक्सान का आकलन करे और मुआवज़ा निश्चित करे ?

और क्यों नहीं उस मुआवज़े में नष्ट हुई फसल के साथ साथ उस गरीब किसान के निवाले को भी जोड़ा जाए अर्थात क्यों नहीं उस मुआवज़े में किसान के वर्ष भर के खाद्यान का भी जुगाड़ हो ?

सरकार किसी की मौत पर मनमर्ज़ी का  मुआवज़ा बाँट कर एहसान करने की जिस मुद्रा में आ जाती है , उसे उस का त्याग करना होगा ...

हम सब को यह बात कूट कूट कर स्वयं और सरकारी कारिंदों के ज़हन में डाल देनी पड़ेगी कि ये देश और टैक्स का पैसा स्वयं जनता का है

और

कारिंदे सिर्फ कार्य सम्पादन के लिए हैं ...

वे हमारे राजा और हमारे पोषक नहीं है

वरन

हम अपने टैक्स के पैसों से उन का पोषण करते हैं ...

मन बहुत उद्वेलित है ...

और सच मानिए इन सब परिस्थितियों के ज़िम्मेदार हम स्वयं हैं ...

हमें अपने आप को सुधारना होगा और इस देश की बागडोर अपने हाथों में लेकर देश को चलाना होगा ...

अब इन राजनेताओं पर भरोसा नहीं कर अपने आप पर भरोसा कर इन से अपने मन मुताबिक़ कार्य करवाना होगा ...

जागिये और अपना और साथी देश वासियों का जीवन सुधारिये ...

कुछ ऐसा करने का प्रयत्न कीजिये कि किसी और गजेन्द्र को हताशा में अपना बहुमूल्य जीवन ना गंवाना पड़े ...

कोई और बच्चे यूँ अनाथ ना हों ...

जागो हनुमान आप में वो शक्ति अन्तर्निहित है ,

बस,

उसे पहचानिये ...

जय हिन्द !!!